झारखंड के शहरों में घट रहे हैं ‘बेहया’

:::मनोज कुमार शर्मा:::

बेहया ,बेशरम, और झारखंड में थेथर नाम से जाना जाने वाला एक पौधा है। इस पौधे का ये नाम इसके बिना किसी अनुकूल परिस्थिति के भी किसी न किसी तरह से वापस पुरजोर तरीके से पनप जाने के कारण है। यह कहीं भी  नदी, नाला, दलदल या तालाब मिला वहां तेजी से फैल जाता है।  अपने नाम से ही यह एक उपेक्षित सा पौधा है, लेकिन बेहया पर्यावरण के लिये बहुत उपयोगी है। यह जलीय इलाकों में उग कर एक प्रकार का इकोसिस्‍टम बनाता है। जिस प्रकार समुद्री तटो में मैंग्रोव के जंगल भूक्षरण से बचाते हैं वैसा ही यह भी करता है। इसका वानस्‍पतिक नाम Ipomoea carnea  है जिसे बुश मॉर्निंग ग्लोरी कहते हैं।

झारखंड के प्रमुख शहरों जैसे रांची, जमशेदपुर में बेहया खत्‍म होते जा रहे हैं। शहरी इलाकों में तालाबों के खत्म होने तेज़ी से कंक्रीट जंगल बढने  और वेटलैंड्स सूखने की वजह से बेहया तकरीबन खत्म हो गए हैं। शहरों को साफ़-सुथरा रखने के लिए भी इसे हटा हटा दिया जाता है।

राँची विश्‍वविद्यालय के वनस्पतिशास्त्रियों ने पाया है कि बेहया का पौधा मिट्टी और गंदे पानी से भारी धातुओं को सोखकर औद्योगिक प्रदूषण को कम करने में अनोखी क्षमता रखता है। इसके अलावा इसमें कई औषधीय गुण भी हैं। हालांकि  शहर के बीचों-बीच शायद ही कहीं दिखे, लेकिन इस पूरे इलाके के ग्रामीण, वेटलैंड और दलदली क्षेत्रों में यह पौधा अभी भी बड़ी संख्या में मौजूद है।

विदेशों में कागज़ बनाने के लिए कच्चे माल के तौर पर और यह पौधा  बहुत ही अच्छा कच्चा माल है। यह पानी के घोल से तांबा हटाने में असरदार है। तांबे को सोखने की दर उसके प्राकृतिक pH स्तर पर सबसे ज़्यादा पाई गई। इसका उपयोग हल्के पॉलीमर कंपोजिट बनाने के लिए फिलर के रूप में किया जा सकता है। इस पौधे में मीथेन की उपयुक्त मात्रा होती है। बेहया बायोकंपोस्ट की सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को बढ़ाने में उपयोगी है और इसमें कीटनाशक के उच्च गुण होते हैं। लेकिन भारत में इसके गुणों का उपयोग न के बराबर होता है।

बेहया के फूल बहुत सुंदर होते हैं और कुछ का दावा है कि बेहया के पत्‍ते ,फूल सांप के विष का तोड़ होते हैं , हालांकि यह वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित नहीं है। बेहया कोई सुंदर सजावटी लोगों का पसंदीदा पौधा नहीं लेकिन प्रकृति के मित्र इस पौधे को शहरीकरण तेजी से कम कर रहा है।

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