:::मनोज कुमार शर्मा::::
रांची : हाल ही में रांची के एक होटल में कुछ लोगों को गोह (Monitor Lizards)के अंगों के साथ वन विभाग और पुलिस की टीम ने गिरफ्तार किया।बताया जा रहा है कि गोह के इन अंगों की तस्करी यौन वर्द्धक दवा या तांत्रिक कार्यों के लिये की जा रही थी।गोह और सांडे को लंबे समय से यौन शक्ति बढाने की दवा बनाने के लिये मारा जा रहा है। हाट बाजार, शहरों में सड़क किनारे या मेलों में इसके वसा से बने तेल को गुणकारी बता कर नीम हकीमों द्वारा बेचा जाता है। आश्चर्य की बात है कि पढे लिखे लोग भी इसपर भरोसा करते हैं जिससे इन जीवों के जान पर आफत है।
पूरे विश्व में यह भ्रम है कि फलां जीव के फलां अंग को खाने या उसके वसा के तेल के सेवन से पुरूष यौन शक्ति बढती है। गोह, सांडा, गैंडे, बाघ, चीता का शिकार सिर्फ खाल के लिये नहीं बल्कि उनके मांस, नाखून, हड्डी, लिंग और जननांगों के लिये किया जाता है। इन सबकों यौनवर्द्धक दवाओं, लकी वस्तु या तांत्रिक क्रियाओं में उपयोग किया जाता है।कुछ साल पहले एक वाकया सामने आया था कि चीन में अमीर पुरूष अकूत पैसा खर्च कर शेर के लिंग का सूप पीते हैं उनका मानना है कि इससे मर्दानगी बढती है। इसके लिये वहां चोरी छुपे इंतजाम किया जाता है। इन धनपशुओं के लिये अफ्रिका से शेर का शिकार और उसके लिंग की तस्करी की जाती है। किसी जानवर के अंगों या तेल से यौनवर्द्धक दवा बनने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन इस भ्रांति में सारे विश्व में नीरीह जीवों, पशु पक्षियों का शिकार उनके विलुप्ति तक अनवरत जारी है।
गोह को किसी खड़े चिकने दीवार पर मजबूती से चिपकने में महारत हासिल होती है। ऐसा इसके पंजों में बने खास बनावट के कारण संभव हो पाता है।छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनापति तानाजी मालुसरे की विशाल गोह (मॉनिटर लिज़र्ड) का नाम यशवंती था। इसका उपयोग 4 फरवरी 1670 की रात कोंढाना (सिंहगढ़) किले की खड़ी और दुर्गम दीवार पर चढ़ने के लिए किया गया था। तानाजी मालुसरे ने यशवंती की कमर में रस्सी बांधी और उसे दीवार की दरारों पर फेंका था, जिसकी पकड़ के सहारे मराठा सैनिकों ने किले में प्रवेश कर विजय प्राप्त की थी। गांवों में पहले यह कथा प्रचलित थी कि शातिर चोर अपने झोले में गोह और रस्सी लेकर चलते थे और पक्के मकानों और महलों की छतों पर गोह को उसकी पीछ में रस्सी बांध कर फेंक देते थे। गोह मजबूती से चिपक जाती थी और चोर उस रस्सी के सहारे छत पर चढ जाते थे।
गोह (मोनिटर लिजर्ड) सरीसृपों की एक सामान्य प्रजाति है या यूं कहें छिपकलियों की एक बड़ी प्रजाति। गोह (गोयरा’ या ‘विषखोपड़ा’) तकरीबन सारे विश्व में पाये जाते हैं और अपने रंग रूप के कारण ये कहीं भी पसंद नहीं किये जाते। है।विश्व के कुछ इलाकों में इसे खाते भी हैं। इसके अंगों की तस्करी भी की जाती है। रंग रूप बनावट जरा डरावना, मुंह कुछ-कुछ सांप जैसा, शरीर खुरदुरा और ऊपर से छिपकली जैसे घिनौनी से जीव नस्ल। भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत एक संरक्षित प्रजाति है। गोह की खाल और मांस के अवैध शिकार/तस्करी के कारण इन पर संकट मंडरा रहा है। यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण मांसाहारी जीव है और भारतीय कानून के तहत इन्हें मारना या नुकसान पहुँचाना गैर-कानूनी है।
गोह एक शर्मिला और डरपोक जीव है। उत्तर भारत के बाग बगीचों और बंद पड़े मकानों तक में यह रहता है आदमी को देख कर भाग जाता है। भारत में मुख्य रूप से गोह (मॉनिटर लिजार्ड) की चार प्रजातियां पाई जाती हैं।

- बंगाल मॉनिटर (Varanus bengalensis): यह सबसे आम प्रजाति है जो पूरे भारत में, विशेषकर उत्तर भारत के इलाकों में पाई जाती है।
- येलो मॉनिटर (Yellow Monitor): यह पीले रंग का गोह होता है।
- वॉटर मॉनिटर (Water Monitor): यह काफी बड़े आकार का होता है और अक्सर पानी के स्रोतों के पास रहता है।
- डेजर्ट मॉनिटर (Desert Monitor): यह शुष्क और रेगिस्तानी इलाकों में पाया जाता है।
भारत में पाया जाने वाला गोह जहरीला नहीं होता। गोह स्वयं जहरीला नहीं होता, पर यह जहरीले सांपों तक को मार कर खा सकता है , इस पर उनके विष का ज्यादा असर नहीं होता। यह सख्तजान, तेज दौड़ने, तैरने में माहिर होता है और अपने शिकारियों पर पूंछ से चाबुक की तरह वार करता है।
मलेशिया में गोह पूजनीय भी और विलेन भी
हालांकि मलेशिया में गोह की एक खतरनाक प्रजाति कमोडो ड्रैगन पायी जाती है जो भैंसों,
हिरणों, जंगली सुअरों जैसे बड़े जीवों को भी मार कर खा जाती है। कमोडो ड्रैगन जहरीली गोह प्रजाति है यह बड़े आकार के जानवरों को काट लेता है और उनका पीछा करता है, जब वह जानवर लार में मिले जहर के असर से कमजोर हो जाता है तब कमोडो उसे मार कर खा जाता है। ग्रामीणों के पशुधन का इसे नुकसान होता है, और कभी कभार यह मनुष्यों पर भी हमला कर देते हैं।
मलेशिया के ही एक द्वीप में एक बड़े से पालतू गोह को वहां के लोगों ने अली नाम दे रखा था और उसे इतना लकी मानते थे कि उसे खिलाते , दुलारते थे।अली का किसी के घर में आना उस द्वीप के लोग अपने लिये सौभाग्य सूचक मानते थे। यह संयोग था कि अली नाम का वह गोह जिनके भी घर जाकर कुछ खा पी लेता था उसकी आर्थिक स्थिति अचानक सुधर जाती थी। इस कारण से वहां उस गोह के सम्मान में गांव वाले आयोजन करते थे और उसे खिलाते पिलाते थे।
गोह से अलग है सांडा
बहुत सारे लोग सांडा और गोह को एक ही प्रजाति समझ लेते हैं जबकि दोनो अलग-अलग सरीसृप हैं ।
सांडा कंटीले पूंछ वाला सरीसृप है जो राजस्थान के रेगिस्तान में ज्यादा पाया है यह गोह से आकार में छोटा होता है और शाकाहारी होता है। नीम हकीमों ने इसके अंगों और वसा से निकाले गये तेल को यौनवर्द्धक बता कर इतना प्रचारित किया कि इसका बहुत ज्यादा शिकार किया जाता है। हालांकि यह वन्यजीव कानून के अंतर्गत संरक्षित है, लेकिन गांव कस्बों से लेकर महनगरों तक में सांडे के तेल को पुरूषों को ताकतवर बनाने वाला इतना ज्यादा बताया गया कि सांडे की तस्करी होने लगी। जबकि इसके तेल का पुरूष यौनवर्द्धक होने का आजतक कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। संभव है कि इसका भी इतना शिकार हो कि गोह/सांडा भी गौरेया की तरह संकटग्रस्त जीव की श्रेणी में आ जाये।
