बिहार में विकास परियोजनाओं के लिए 5,778 एकड़ से अधिक वन भूमि के उपयोग की तैयारी, पर्यावरण संरक्षण पर उठे सवाल

बिहार में औद्योगिक विकास, बुनियादी ढांचे और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर वन भूमि के इस्तेमाल की तैयारी की जा रही है। राज्य सरकार ने विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए केंद्र सरकार से 5,778.62 एकड़ वन भूमि के उपयोग की अनुमति मांगी है। इन प्रस्तावों में जमुई में सौर ऊर्जा और इस्पात उद्योग से जुड़ी परियोजनाएं शामिल हैं। वहीं, गया में प्रस्तावित चिड़ियाघर और औद्योगिक परियोजनाओं को भी आगे बढ़ाने की योजना है।

इसके अलावा, पश्चिम चंपारण स्थित वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में सड़क को एलिवेटेड कॉरिडोर के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है, ताकि वन्यजीवों की आवाजाही प्रभावित न हो। मुंगेर के भीमबांध में ईको-टूरिज्म विकसित करने की योजना भी प्रस्तावित है। इससे पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

हालांकि, इन विकास परियोजनाओं के बीच पर्यावरण संरक्षण एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। वन भूमि के उपयोग से जंगलों का क्षेत्रफल, जैव विविधता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित होने की आशंका है। इसका असर जंगलों पर निर्भर आदिवासी, वनवासी और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।

ऐसे में जरूरी है कि विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले उनके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गंभीरता से आकलन किया जाए। वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों, ग्राम सभाओं की भूमिका और स्थानीय समुदायों की सहमति को भी महत्व दिया जाना चाहिए। सवाल यह है कि क्या बिहार रोजगार और औद्योगिक विकास के साथ अपने जंगलों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों को भी सुरक्षित रख पाएगा? विकास तभी सार्थक होगा, जब जल, जंगल और जमीन का संरक्षण सुनिश्चित हो।