::सुजीत कुमार वर्मा::
शहरों की चमकती सड़कों, ऊंची इमारतों और बाजारों के बीच एक ऐसी तस्वीर भी दिखाई देती है, जो शहरी विकास के दावों के सामने कई सवाल खड़े करती है। भूख से बेहाल गायें, बैल और दूसरे आवारा पशु कूड़ेदानों में भोजन तलाशते नजर आते हैं। उनके लिए डस्टबिन सिर्फ कचरे का ढेर नहीं, बल्कि पेट भरने की एक उम्मीद बन जाता है।
देश में 2 करोड़ से अधिक आवारा कुत्ते और मवेशी
केंद्र सरकार की ओर से 15 मार्च 2022 को संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 20वीं पशुधन गणना (2019) में देश में आवारा कुत्तों और आवारा मवेशियों की कुल संख्या 203.31 लाख यानी लगभग 2.03 करोड़ दर्ज की गई थी। यह आंकड़ा दोनों श्रेणियों को मिलाकर है, केवल गायों या मवेशियों का नहीं। स्रोत: प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB)
दूसरी ओर, केंद्र सरकार के अनुसार, वर्ष 2021-22 में देश में प्रतिदिन 1.70 लाख टन से अधिक नगरपालिका ठोस कचरा उत्पन्न हो रहा था। यह आंकड़ा बताता है कि शहरी कचरे का प्रबंधन भी एक बड़ी चुनौती रहा है।
कूड़े में भोजन, सेहत पर खतरा
सड़कों और खुले कूड़ेदानों में भोजन तलाशने वाले पशुओं को कई बार सड़े हुए खाद्य पदार्थों, प्लास्टिक और अन्य हानिकारक कचरे के संपर्क में आना पड़ता है। प्लास्टिक निगलने और दूषित भोजन खाने से उनके स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, कूड़े में भोजन तलाशने वाले पशुओं की देशव्यापी अलग संख्या का कोई पुष्ट आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
समाधान के लिए जरूरी हैं ठोस कदम
पशु कल्याण के लिए केवल आश्रय गृह बनाना पर्याप्त नहीं है। नगर निकायों को नियमित कचरा संग्रह, गीले और सूखे कचरे का पृथक्करण, खुले डस्टबिन पर नियंत्रण और घायल पशुओं के उपचार की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। साथ ही, पशुओं को छोड़ देने की समस्या पर कार्रवाई और गौशालाओं की क्षमता बढ़ाने की जरूरत है।
केंद्र सरकार के अनुसार, आवारा पशुओं के प्रबंधन और सार्वजनिक स्वच्छता की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य सरकारों तथा स्थानीय निकायों की है।
सवाल सिर्फ इतना नहीं कि शहर कितना साफ है, बल्कि यह भी है कि उसकी गलियों में भूखे घूम रहे बेजुबानों को सुरक्षित भोजन और आश्रय कब मिलेगा।
